Wednesday, April 10, 2013

''ओह माई गॉड''

पिछले दिनों बहुत कुछ हुआ, कहीं आसाराम बापू ने भगवान को अपना यार बना लिया तो राहुल गाँधी ने देश को मधुमक्खी का छत्ता कह डाला, जहाँ रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के गवर्नर साहब ने बढ़ती महंगाई का दोष गाँव वालों के अच्छे खाने पर मढ़ दिया, वहीँ मोदी महिलाओं की तारीफों के पुल बांधने में लगे थे, इन सबके बीच हर मुद्दे को ठेंगा दिखाते हुए IPL अपनी ही धुन में मग्न है।

लिखने के लिए इतना कुछ है कि पहले किस पर लिखूँ यही समझ नहीं आ रहा। जिस तरह हर काम की शुरुआत भगवान के नाम से करनी चाहिए उसी तरह मैं भी पहले उन्हीं पर आती हूँ। कुछ समय पहले आसाराम ने बयान दिया था कि ''भगवान तो मेरा यार है मैं जब चाहूँ उससे कह कर बारिश करवा सकता हूँ'' बापू जी महाराष्ट्र को पानी की ज़रूरत है अपनी ज़ुबान चलाने के बजाये वहाँ अपने वर्षा रूपी बाण क्यों नहीं चलते आप।

मेरे एक जानने वाले हैं जिनके घर पर आसाराम के नाम की चालीसा पढ़ी जाती है वो भी जीते-जागते आसाराम की तस्वीर पर माला चढ़ा कर, और तस्वीर भी कैसी साक्षात् कृष्णा के अवतार में, कुछ ऐसी----
अब इस तस्वीर को देखकर ये समझना मुश्किल है की आसाराम, भगवान को अपना यार मानते हैं या ख़ुद को साक्षात् भगवान।

काला पर्स तो याद ही होगा न, जिसे हर रोज़ दोपहर 3 बजे घर की महिलाओं के साथ आदमी भी लेकर कर TV के सामने बैठ जाया करते थे इस उम्मीद में कि निर्मल बाबा के दर्शन भर से उनका पर्स रुपयों से भर जायेगा। बाज़ारों में रातोंरात काले पर्स की मांग बढ़ गयी थी, सब निर्मल बाबा की कृपा से। उनका तो अपना एक दानपत्र भी हुआ करता था जिसमे धनराशि जमा करने  लिए बकायदा टीवी पर पता भी दिया जाता था। जिसके सहारे उन्होंने कई सौ करोड़ की संपत्ति भी बना ली। भक्तों द्वारा दी गई धनराशि का उपयोग कहाँ किया जाता था इसका आज तक कोई ब्यौरा सामने नहीं आया हैं।

हाल ही में एक फिल्म आई थी, ''ओह माई गॉड'' जिसमें इन सभी मुद्दों को उठाकर लोगों की आँखों पर पड़ी पट्टी को हटाने की कोशिश की गई। फ़िल्म काबिले तारीफ़ थी, पर अपने उद्देश्य में कहा तक सफल हुई यह तो फ़िल्म देखने वालों पर ही निर्भर करता है। यहाँ तो मैंने मात्र दो नाम लिये है, समाज में ऐसे और कई साधू-संत और बाबाओं की भीड़ है जो आये दिन लोगों की भक्ति और श्रद्धा के साथ खिलवाड़ करते है। हम जानते है वो भगवान नहीं है फिर भी आस्था में अंधे होकर हम इनकी शरण में चले जाते है, और ये भगवान के नाम पर धंधा चलाते हुए अपना बैंक बैलेंस बनाते है।
 






Tuesday, April 9, 2013

अगर फोटोग्राफर चाहता तो बच्ची कुत्तों का भोजन ना बनती

हाल ही एक अख़बार में ख़बर छपी थी, ''फेंकी गई नवजात बच्ची को नोंचकर खा गये कुत्ते''. विचलित कर देने वाली तस्वीरों से अख़बार का पहला पन्ना पटा पड़ा था।  तस्वीरें देखकर हर किसी का दिल दहल जाये। नीचे इन तस्वीरों को खींचने वाले फोटोग्राफर का नाम भी छपा था। ख़बर लिखने वाले ने वहाँ मौजूद पुलिसकर्मियों और आमजनों की संवेदनहीनता को खूब कोसा। एक अस्पताल के सामने नवजात बच्ची को फेंक दिया गया। वहाँ से गुज़रने वाले किसी भी शख्स ने उसे सुरक्षित स्थान तक पहुँचाने की ज़हमत तक नहीं उठाई। फोटोग्राफर ने हर प्रकार से उसकी तस्वीरें ली। सड़क पर उसका पड़े रहने से लेकर कुत्तों का उसे नोंचकर खाने तक की तस्वीरें।
पर सवाल यह है की तस्वीरें खींचकर दूसरों को कोसने वाले फोटोग्राफर की इंसानियत उस समय कहाँ चली गयी थी, जब वह सड़क किनारे पड़ी थी। वह चाहता तो बच्ची को सुरक्षित स्थान तक पहुँचा सकता था, जिससे शायद नवजात बच्ची कुत्तों का भोजन बनने से बच जाती। लेकिन यहाँ उसकी प्राथमिकता तस्वीरें खींचकर पुलिस और प्रशासन की लापरवाही दिखाना था ना कि उस मरती हुई बच्ची की जान बचाना। क्या होता अगर वह तस्वीर ना लेता, बस इतना कि अगले दिन यह ख़बर ना छपती, लेकिन अपनों द्वारा ठुकराई गयी वह नन्ही जान तो बच जाती। यदि फोटोग्राफर चाहता तो एक ज़िम्मेदार नागरिक का फ़र्ज़ निभाते हुए पुलिस में इसके खिलाफ़ रिपोर्ट दर्ज़ करवा सकता था, लेकिन वह भी मात्र एक मूकदर्शक बन तस्वीरें ही लेता रहा।
क्या पत्रकारों का फ़र्ज़ सिर्फ़ ख़बर छापने तक ही सीमित है। बात जब इंसानियत का फ़र्ज़ निभाने की आती है तो क्यों ये दूसरों को कोसते नज़र आते है। ज़रुरत पड़ने पर ख़ुद आगे आकर ग़लत होने से रोकते क्यों नहीं??? मेरी उस फोटोग्राफर या अख़बार से जुड़े किसी भी शख्स से कोई निजी दुश्मनी नहीं है। पर तस्वीर पे नज़र पड़ते ही पहली बात मन में यही आई कि वह चाहता तो बच्ची को कुत्तों के मुहं में जाने से बचा सकता था। वह चाहता तो बच्ची इस दुनिया में साँसे ले सकती थी। वह चाहता तो उसकी जान बच सकती थी। अगर वह चाहता तो….