Friday, June 28, 2013

प्यार- मेरी नज़र से...

प्यार में दो तरह की Relationships होती है-
1 - Close Relationship
2 - Long Distance Relationship

Close Relationship में जहाँ लड़का और लड़की हर वक़्त साथ रहते हैं, साथ घूमते हैं, मॉल, बाज़ार, सड़क जैसी सार्वजनिक जगह में एक दुसरे का हाथ इतनी कस के पकड़े रहते हैं मानो जन्म से ही हाथों में फेविकोल लगा  दिया गया हो, खैर, ये प्राय: थिएटर की कोने वाली सीट में, गार्डन में पेड़ के नीचे या झाड़ियों के पीछे भी पाए जाते हैं। और हाँ यहाँ मैंने लिव-इन रिलेशनशिप वालो का ज़िक्र इसलिए नहीं किया क्योंकि वो भी काफ़ी हद तक इनसे ही मिलते जुलते हैं।

वहीँ इसके उलट बेचारे Long Distance Relationship वाले हर समय फ़ोन या इन्टरनेट के साथ ही पाये जाते हैं। क्योंकि यही उनका पहला और आखरी सहारा होता है जिसके ज़रिये वो एक दूसरे से बात कर पाते है या एक दूसरे को देख पाते हैं। इनके मन में हर वक़्त कुछ न कुछ डर समाया रहता है, ये insecurity से भरे रहते हैं, कहीं मेरे पार्टनर का किसी और के साथ चक्कर तो नहीं, कहीं वो किसी और के साथ तो नहीं घूम रहा/रही, कहीं मेरे फ़ोन रखने के बाद वो किसी और से तो बात नहीं कर रहा/रही....ऐसा तो नहीं की मेरे अलावा वो किसी और से भी चैट करने में busy हो.....ऒहहह....कितना कुछ है इनके पास सोचने के लिए।

Close Relationship वालों के पास सोचने के लिये कुछ ख़ास होता ही नहीं। इसमें कई फ़ायदे हैं आप कभी भी अपने पार्टनर का फ़ोन उठा के कॉल डिटेल या inbox चेक कर सकते हैं, उसकी बेस्ट फ्रेंड को पटा के उसके बारे में हर ख़बर रख़ सकते हैं, वो जहाँ भी जाये वहां सरप्राइज देने के बहाने पहुंच सकते हैं, हर वक़्त उसके साथ फ़ोन पर लगे रह सकते हैं क्योंकि लोकल कॉल पर तो अम्बानी भी फ़िदा हैं, पार्टनर को उनसे ही बात करने देते है जिन्हें वो खुद जानते हों, कॉलेज, ऑफिस जो भी हो ख़ुद छोड़ने जाते है और ख़ुद लेने भी आते हैं। पार्टनर के सुबह जागने से लेकर रात को सोने तक की हर छोटी से बड़ी ख़बर रखते हैं, Insecurity नाम की चिड़िया तो इनके आस-पास भी नहीं उड़ती। (शायद)

वैसे फ़ायदे तो Long Distance Relationship में भी कम नहीं हैं। उसमें पार्टनर अपका फ़ोन चेक तो क्या छू भी नहीं सकता, किसी से भी बात करो पार्टनर देखने तो आयेगा नहीं, फ़ोन पर भी हर समय नहीं रहा जा सकता कॉल STD जो है, जैसे चाहो वैसे रहो टोकने के लिए पार्टनर तो है ही नहीं। मूवी देखते वक़्त ये भी बोल दो की घर में गाने सुन रहे तब भी उसे मानना पड़ेगा, क्योंकि वो बेचारी/बेचारा आपको सरप्राइज देने अचानक पहुँच भी तो नहीं सकती/सकता।

रिलेशनशिप जो भी हो सबसे ज़रूरी है एक-दूसरे के लिए विश्वास। हमें अपनी सोच कभी भी दूसरे के ऊपर थोपनी नहीं चाहिए, शक नाम की बिमारी को कभी भी बीच की दीवार नहीं बनने देना चाहिए, दूर हो या पास ज़रूरी है एक दूसरे के साथ होना, एक दूसरे के लिए निश्छल, निस्वार्थ प्यार होना, शिकवे-शिकायत करने के लिए पूरी ज़िन्दगी पड़ी है, लेकिन अगर साथ है तो प्यार करने के लिए एक ज़िन्दगी भी कम पड़ जाती है।









Tuesday, June 18, 2013

रूठ गया बचपन...

उफ्फ...ये पढ़ाई कब ख़त्म होगी??? किसने बना दी ये किताबें??? कब ख़त्म होंगे हर साल आने वाले ये exams??? अपने आप से ये सवाल ना जाने कितनी बार किया मैंने। हमेशा से बड़ों को देखकर लगता था की उनकी ज़िन्दगी सबसे अच्छी होती है....ना कोई डाँटने वाला, ना कोई पढ़ाई के लिए फ़ोर्स करने वाला, ना तो उन्हें मैथ्स की equation solve करनी पड़ती है, ना ही exams देने होते हैं और ना ही आने वाले Results की चिंता होती है।
यही ज़िन्दगी तो चाहिये थी मुझे...

मगर आज जब मैं वही ज़िन्दगी जी रही हूँ तो क्यों सब कुछ होने के बाद भी लगता है जैसे कुछ अधूरा है... वो स्कूल कैंटीन के 2 रुपए के 5 गोलगप्पे... दोस्तों के साथ घंटों बैठकर मारे हुए गप्पे...क्लास बंक करके डांस प्रैक्टिस में लगाये हुए ठुमके...रेनी डे पर स्कूल का गोला... वो गर्मी की छुट्टियों का बेसब्री से इंतज़ार... वो कहो ना प्यार है देखने के बाद ह्रितिक के लिए प्यार...
सब कुछ आज एक सपने जैसा लगता है...

हर बात से बेफ़िक्र तब कहाँ पता था की हर कदम पर देने वाले इम्तिहान से तो हर साल आने वाले इम्तिहान ज्यादा अच्छे लगेंगे। तब ये तो पता था कि जो भी हो पास तो हो ही जाना है...पर आज ज़िन्दगी के किस इम्तिहान में फ़ेल हुए और किसमें पास यह पता लगाते-लगाते ही पूरी ज़िन्दगी बीत जाती है। तब कहाँ पता था बचपन की कीमत क्या होती है...दोस्तों के साथ समय गुज़ारने का लुत्फ़ क्या होता है...

इस भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में हमे हमारे अपनों के लिए ही वक़्त निकलता पड़ता है...दोस्तों से मिलने के लिए भी उनके वक़्त का इंतज़ार करना पड़ता है...कभी कभी तो लगता है, क्यों हमारा बचपन इतनी जल्दी हमसे रूठ गया...क्यों गर्मी की छुट्टियों का इंतज़ार ख़त्म हो गया...क्यों हम इतनी जल्दी बड़े हो गये??? क्यों ???
अपने बचपन से बस यही कहना चाहती हूँ...
रूठ के हमसे कभी जब चले जाओगे तुम... ये ना सोचा था कभी इतने याद आओगे तुम…