Wednesday, March 4, 2015

क्यों न थोड़े मतलबी हो जाये...




                                                       क्यों न थोड़े मतलबी हो जाये...
सुबह ऑफिस जाने की जल्दी, दिनभर काम की भागा-दौड़ी... कुछ याद है, परिवार संग यूँ ही गप्पे लड़ाते हुए आखिरी बार कब चाय का प्याला हाथ मे लिया था... कभी टीवी तो कभी स्मार्ट फोन की दुनिया मे मस्त, कुछ याद है आखिरी बार कब खुली हवा मे किसी अपने के साथ चंद पल गुजारे थे...सबको खुश करने के फेर मे चेहरे पर बनावटी मुस्कान लिए, कुछ याद है आखिरी बार कब सच्ची मुस्कुराहट को जिया था...
कुछ याद है आखिरी बार कब जिये थे, वो सुकून भरे पल... आखिरी बार कब हुए थे थोड़ा मतलबी...

8 comments:

  1. अपने लिए थोड़ा समय निकालने को अगर लोग मतलबी होना कहते हैं तो . मैं मतलबी हूँ.
    सार्थक प्रस्तुति.
    यहाँ भी आइए.
    http://iwillrocknow.blogspot.in/

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  2. बहुत सुंदर! इस रचना को पढ़कर मुझे वो गीत याद आ गया.
    "मतलबी....हो जा ज़रा मतलबी...दुनिया की सुनता है क्यों, अपनी भी सुन ले कभी"!!

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  3. hmmm... kabhi kabhi honaa bhi chahiye...

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  4. आदरणीया सुप्रिया जी
    कृपया अपने ब्लॉग को ब्लॉगसेतु ब्लॉग एग्रीगेटर से जोड़ने की कृपा करें. ताकि अधिक से अधिक पाठक आपके ब्लॉग तक पहुँच सकें. धन्यवाद.
    यह रहा ब्लॉगसेतु का लिंक .....
    https://blogsetu.com/

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  5. wevr working as a Machine. No rest no time. But you will feel refresh after injoy.

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